Tuesday, September 12, 2017

तीन और दो पांच लोग


ये घर था तो शहर के लगभग बीच में, पर शहर से दूर था.
शहर के तमाम व्यस्त रास्तों के बगल से गुज़रने के बावजूद वो घर शहर की गिरफ्त से दूर था.
घर के चारों और ख़ूब सारे पेड़ और झाड़ियाँ थीं. आस पास कुछ और बड़े बंगले थे जिनमें लम्बे चौड़े लॉन और पार्किंग स्पेस थे. इन सबने कुछ ऐसा माहौल बना दिया था कि यहाँ शहर का शोर धीमा और दूर से आता सुनाई देता था. जैसे यहाँ पहुँचने से पहले किसी आवाज़ सोखने वाले अस्तर से छन कर मंद हो जाता हो. वो अक्सर  नास्टैल्जिया में बजने वाले किसी राग की तरह बजता हुआ लगता था.




इस घर में तीन लोग रहते हैं. डॉ. हिम कुमार, उनकी पत्नी लीना कुमार और बेटा विपिन.
डॉ कुमार की उम्र ज्यादा है.सक्रियता को देखते हुए उनके बारे में बहुत आशावादी तरीके से सोचा जा सकता है कि वे अपनी ज़िन्दगी का सैकड़ा पूरा कर सकते हैं. उनको रिटायर हुए बरसों हो गए है. कभी वे शहर के नामी डॉक्टरों में गिने जाते थे. इस शहर में, और शहरों की तरह ही डॉक्टरी को किसी ज़माने में बेहद अभिजात्य पेशा माना जाता था. अभी भी माना जाता है पर अब.. काफ़ी फ़र्क भी आ गया है.

डॉ.हिम कुमार के सेवाकाल में शहर में गिने चुने ही डॉक्टर हुआ करते थे. और हर डॉक्टर कभी न कभी एक्स महाराजा का इलाज करने पैलेस में हाज़री दे चुका होता था.पैलेस से बुलावा आने पर डॉक्टर सारे काम छोड़कर स्कूटर से महाराजा साहब के निवास की ओर रवाना हो जाता. इसमें डिपार्टमेंट की भी मूक सहमति सी होती. क्योंकि विभाग ने इसका कभी संज्ञान उस तरह से नहीं लिया. शाही पैलेस में डॉक्टर हिज हाइनेस के परिवार की मेजबानी का सुख भोगता.

डॉ. हिम सरकारी डॉक्टर थे और घर में भी प्रैक्टिस करते थे. उनके ज़माने में शहर में तीन ही डॉक्टर थे जिनका नाम हुआ करता था. उनके  अलावा डॉ. माथुर और डॉ. भंडारी भी शहर की जानी मानी हस्तियों में गिने जाते थे.
डॉ.कुमार जब रिटायर हुए तो उन्हें लगा उन्हें इस शहर में याद रखने वाले कभी कम न होंगे. नए डॉक्टर उनके पास मार्गदर्शन लेने हमेशा आते रहेंगे. उनके जन्मदिन पर विश करने वाले सुबह से ही आने शुरू हो जाएंगे और फ़ोन तो रात 12 बजे तारीख बदलते ही घनघनाने लग जाएंगे. वे इस शहर के लिए हमेशा प्रिय बने रहेंगे. आखिर उनका जलवा लम्बे अरसे तक रह चुका था. पर रिटायर्मेंट के ठीक पांच साल बाद उन्हें इस शहर ने भुलाना शुरू कर दिया.और ये सब धीरे धीरे नहीं हुआ बल्कि एकदम से और लगभग झटके के साथ हुआ. जैसे इस साल बड्डे विश हुआ हो और अगले साल बिलकुल नहीं. जैसे इस बार मैरी क्रिसमस हुआ हो और अगली बार बिलकुल नहीं.जैसे सारा शहर एकदम से किसी दूसरे शहर में तब्दील हो गया हो. कायांतरण. किसी अजनबी, नामालूम शहर में.
क्या ऐसा हो सकता है कि शहर में किसी अजाने शहर का भूत घुस जाए? शहर के पत्थर, चट्टानें, रंग रोगन वही पर जैसे शहर कोई और ही हो. कौन ओझा बता सकता है कि इस शहर में फलाने शहरे का प्रेत है.कोई एक्ज़ोर्सिस्ट होता है क्या शहर में घुसी नामालूम शहर की शै जो खींच कर निकाल सके?
और तो क्या वजह हो सकती थी डॉ. कुमार को इस शहर द्वारा एकदम से भुला दिए जाने की?
तमाम तरह की विशेज़ का वॉल्यूम एक दम से कम हो गया. इस शहर ने उन्हें इतना जल्दी भुला दिया कि उन्होंने भी इस शहर में गुज़री पूरी ज़िन्दगी के बड़े हिस्से के बारे में सोचना भी बंद सा कर दिया. और उन्होंने इस शहर में रहते हुए भी अपने बचपन और तरुणाई के शहर ‘ल' को याद करना शुरू कर दिया जो इस शहर से बहुत दूर कहीं था. आजकल एक नया शौक उनके सर चढ़ा है.हल्का हल्का रेडियो बजाना.शौक  ज़रूर नया था पर प्यार पुराना था.रेडियो सुनना उनके बचपन का पहला प्यार था. बचपन में रेडियो से कुछ भी सुनना उनका जूनून हुआ करता था. घर में एक बड़ा सा रेडियो था जिसकी उपस्थिति बड़ी वज़नदार हुआ करती थी. आसपास कोई रेडियो किसी और के घर में नहीं था. उनका परिवार ‘ल' के बड़े अभिजात्य परिवारों में माना जाता था.उनके दादा अंग्रेजी, फ़ारसी और संस्कृत के विद्वान् थे. उन्हें अँगरेज़ सरकार से बड़े इनाम इकराम मिले हुए थे. रेडियो किसी के घर में होना इतनी बड़ी बात थी कि उनके घर को रेडियो वाला घर ख़ानदान कहा जाता था. उन दिनों के डॉ. हिम अपने कद से कहीं बड़े, ऊंचे और भव्य रेडियो को बड़ी हसरत भरी नज़रों से देखते थे और जब वो बजता था तो उसके आसपास ही घूमा करते थे.अब पॉकेट साइज़ के रेडियो से उनका उनका रिश्ता ज़रा अलग किस्म का है. इसके ज़रिये अब वे अपने शहर ‘ल' को एक नए कोण से देख पाते है. एक बजता रेडियो उन्हें अपने बरसों पुराने घर में ले जाने का काम करता है. कुछ बहुत उम्र का तकाजा और कुछ इन दिनों उनके स्वाभाव में उतर आई सनक के कारण वो रेडियो को कुछ कुछ जादू का डिब्बा मानने लगे हैं. उनके मुताबिक रेडियो पर अनजान देशों के प्रसारण ट्यून किये जा सकते है. रात को कई बार वो शोर्ट वेव पर अनजान भाषाओं के प्रसारण लगा देते. बहुत पक्के तौर पर तो नहीं पर कहीं न कहीं उन्हें ये अंदेश था कि रेडियो से कभी न कभी एलियंस के सन्देश सुने जा सकते हैं. उनका ये भी मानना था कि एलियंस कई बार अपने आने की आहट दे चुके हैं और हमने न जाने कितनी बार बल्कि हर बार उन्हें उन्हें अनसुना कर दिया है.




उनकी पत्नी डॉ. लीना भी बुज़ुर्ग है. वे डॉ.कुमार से पांच साल छोटी हैं पर दोनों पति-पत्नी की उम्र अब इतनी है कि दोनों बराबर के लगते है.बीमारियों के लिहाज़ से डॉ. लीना ज्यादा बीमार हैं. उनकी दिन भर की गोलियां बारह हैं, जबकि कुमार साहब पांच ही ले ते हैं. डॉ. कुमार को बुढ़ापे के आलावा कोई बीमारी नहीं है. डॉ. लीना भी बरसों पहले सरकारी सेवा से रिटायर हो चुकी हैं. वे सरकारी जनाना हॉस्पिटल में डॉक्टर थीं. उन्हें सेवा में रहते हुए भी डॉ. कुमार की पत्नी के रूप में ज्यादा जाना जाता था.इस शहर की होते हुए भी उन्हें लोग डॉ. लीना के रूप में कम ही जानते थे. कुछ बुज़ुर्ग लोग ज़रूर उनके पीहर के खानदान से वाकिफ़ थे पर ऐसे लोग बहुत गिने चुने ही थे. रिटायर मेंट के बाद डॉ. कुमार की तरह उन्हें भी शहर ने अपनी यादों से बुहार कर बाहर कर दिया. पर इसका उनको कोई ग़म नहीं था क्योंकि वे इसी शहर की थीं और डॉ. कुमार से प्रेम विवाह करने पर उन्हें उनके कथित अभिजात्य समाज ने जिस तरह तिरस्कृत किया था उसकी प्रतिक्रिया में उन्होंने अपने समाज और इस शहर दोनों को अपनी जुड़ाव-लगाव की तमाम किताबों से फाड़ कर फेंक दिया था.

डॉ.लीना मूलतः इस शहर की ही हैं इस बात को आज कोई नहीं जानता. और इस बात की किसीको परवाह भी नहीं हैं.

डॉ.दम्पति का बेटा विपिन भी अब अधेड़ उम्र का हो गया है. उसने शादी नहीं की ये कहना उतना ठीक नहीं होगा जितना ये कहना कि वो शादीशुदा नहीं है. विपिन के व्यवहार से लगता नहीं कि उसने शादी करने की कभी गंभीर कोशिश की होगी. उसे कविताएं लिखने में रूचि है.

डॉ.दम्पति को रिटायर हुए इतना वक्त हो गया था कि उन्हें अपने बिजी दिनों को याद करना पड़ता था.मरीजों की रेलमपेल के बीच हर वक्त काम में लगे रहना इतनी पुरानी बात हो गयी थी कि वो उनकी अपनी बात थी ये मानने में उन्हें खासा वक्त लग जाता था.रिटायरमेंट के बाद घर से बाहर निकलने का सिलसिला, दोस्तों-परिचितों के घर जाने का सिलसिला कुछ महीनों चलता रहा पर एक दिन डॉ.कुमार को समझ में आ ही गया कि घर से बाहर बाज़ार जाना थकने वाला काम है.दोस्तों के घर जाना एकतरफा काम है. वो लोग अब उनके यहाँ आने वाले नहीं है. गर्म जोशी में गिरावट इतनी जल्द थी कि इस अचानक आई बीच की ठंडक को डॉ कुमार महसूस करने लग गए थे.लिहाज़ा डॉ कुमार और डॉ लीना घर में ही सीमित हो गए. उन्हें देखकर कोई भी ये कह सकता था कि वे सेवानिवृति का जीवन जी रहे है. गाहे बगाहे कोई घर आता या पडौसी किसी बहाने घर आते और कमेन्ट करते कि आपने ख़ूब काम कर लिया अब घर में आराम से पसर कर आराम का वक्त है, या कि भाई आपके तो बड़े ठाठ है तो डॉ कुमार को असहनीय पीड़ा होती.पर वे कुछ बोलते नहीं.वे सोचते रिटायर्ड लाइफ का आराम ज़माने में एक कोम्प्लिमेंट की तरह कहा जाता है.भले उन्हें इस तरह के जीवन में मज़ा नहीं आ रहा हो पर क्या पता बाकी सब जिंदगी के इसी मुकाम का बेसब्री से इंतजार करते हों.

तो इस तरह उनके जीवन में ये लम्बा आराम चलता रहा.ये आराम उनकी ज़िदगी से भी बड़ा होने लग गया.घर और बाहर को जोड़ने वाली चंद चीज़ें थीं.

एक- डोर बेल
वो इतनी जोर से बजतीं थीं कि आजकल उसका बजना कम होने पर लगने लगा था कि दुनिया बड़ी चुप्पा सी हो गयी है.

दो-  टीवी
वो घर की एक दीवार पर लगा था. उसके ज़रिये डॉ कुमार अंदाज़ लगाते थे कि बहार दुनिया ठीक ठाक चल रही है.पर उसके विजुअल्स रियल टाइम में नहीं होते ऐसा डॉ कुमार का सोचना था.और टीवी घर को बाहर से  सीधा जोड़ने वाला उपकरण नहीं हो सकता.पानी में जैसे कोई सीधी चीज़ मुड़ी हुई दिखती है.ऐसे कुछ दिखाने का काम करता है टीवी. चीज़ें जैसी होती नहीं वैसी दिखाता है टीवी. अगर डॉ कुमार धर्म गुरु की भाषा में बोलते तो कहते टीवी शैतान का नुमाइंदा है.

तीन- टेलीफोन

ये काला और ठंडा उपकरण कई बरसों से लगा था.इसकी घंटी की आवाज़ भी घर के सन्नाटे को एक दम से तोड़ कर रख देती थी.डॉ कुमार टेलीफोन से बातचीत को इकतरफा संवाद जैसा मानते थे.बिना सामने वाले को देखे,बिना उसके हाव भाव को देखे आप उससे बात नहीं कर सकते.सिर्फ डार्ट गेम खेल सकते है.कभी जैसे तुक्के से संवाद स्थापित हो जाय जैसे.

चार- सनीचरिया या देशांतरी-

हर शनिवार को ये शनि भगवान के नाम पर तेल और आटा लेने आता था. इन दिनों वो शनिवार की आवाज़ देके आसपास फेरी देने चला जाता था और लौट कर आखरी घर के रूप में डाक्साब के यहाँ आता था. यहाँ वो उनके लॉन में तनिक देर फूंकारा खाता था. डाक्साब भी उससे कुछ देर कभी कभी बोल लेते थे. डाक्साब की उसके बारे में कोई खास राय नहीं थी पर ज़ाहिर है वो उसे नापसंद भी नहीं करते थे.





इन चारों के अलावा दो और थे जो इस घर को बाहर से जोड़ने का काम करते थे. नौकर रमेश और उर्मिला.
रमेश कम बोलता था पर उर्मिला बातूनी थी.उसे काम करते करते बोलने में दक्षता हासिल थी. रमेश वैसे ही कम बोलता था और उसे लगता था कि काम और बोलना दोनों एक साथ नहीं हो सकता. रमेश बाज़ार के काम देखता था और उर्मिला घर के सारे काम किया करती थी. पर ये दोनों ही थे जो कम या ज्यादा, घर में और बाहर आवाजाही किया करते थे. और हां दोनों अपने अपने घरों में रहते थे इसलिए इस घर में रोज़ उनका बाहर से आना और बाहर को जाना कम से कम एक बार तो होता ही था. असल में उर्मिला की मां पहले इसी घर में काम करती थी. उर्मिला तब छोटी थी. उन दिनों उर्मिला की मां ही अकेली नौकर ही थी. उर्मिला को कभी कभार वो अपने साथ ले आया करती थी.बरसों तक ये सिलसिला चला.उर्मिला बड़ी होने लगी और वो अपनी मां के साथ अक्सर इस घर में आने लगी. वो थोडा बहुत मां का हाथ बंटा देती थी. फिर उर्मिला ज्यादा आने लगी और उसकी मां का आना कम होने लगा. जैसा कि उम्र बढ़ने के साथ उन दिनों होता था, उसकी मां खांसी से परेशान रहने लगी. खांसी शुरू होने पर रुकने का नाम ही नहीं लेती थी. डॉक्टरों वाले इस घर में भी उसकी कोई मदद हो नहीं पाई. अब सिर्फ उर्मिला ही इस घर में आने लगी. उसकी मां ने आना बिलकुल बंद कर दिया था. मां की जगह उर्मिला इस कदर धीरे धीरे आई थी कि घर वालों को इस परिवर्तन का पता ही नहीं चला. उनके लिए जैसे उर्मिला ही हमेशा से इस घर में आती रही थी. उर्मिला घर का सारा काम बहुत दक्षता से करती थी पर वो अकेली इस घर के काफी नहीं थी. खासकर तब से जब इस घर के लोग घर से बाहर निकलने में दिक्कत महसूस करने लगे, ऐसा भी धीरे धीरे ही हुआ था और पूरे घर का बूढाते जाना इसमें मुख्य कारण था, तब रमेश को रखा गया.रमेश की ज़िम्मेदारी घर से बाहर के कामों की थी.बाज़ार से सौदा लाना,बिल विल जमा करवाना, दवा दारु का प्रबंध वगैरा वगैरा. ऐसा नहीं था कि रमेश के जिम्मे सिर्फ और सिर्फ घर से बाहर के ही काम थे, बल्कि घर में नल ठीक करना,बिजली के बल्ब बदलना,कील ठोकना जैसे काम भी उसी के दायरे में आते थे. रमेश का मन पढने में नहीं लग पाया.वो ग्यारहवीं तक किसी तरह पढ़  पाया फिर उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया.घर की हालत कुछ खास अच्छी नहीं थी कहना अंडर स्टेटमेंट होगा.घर की हालत ख़राब थी.बड़े भाई महेश ने पिताजी का रिटायर्मेंट के बाद मिले पैसे को ठिकाने लगा दिया था.और जब लगा कि अब कुछ बाकी नहीं है,बीवी को लेकर अलग रहने लगा. ये एक तरह से ठीक ही हुआ. कम से कम पिताजी को अपनी पेंशन के पैसे खुद खर्च करने का हक़ हाथ आ गया. अगर महेश साथ रहता तो वो महीने दर महीने इन पैसों पर भी डाका डालने की फिराक़ में रहता. रमेश अपने भाई की की करतूतों और बाकी सब वजहों से काम की तलाश में था और उसे यहाँ मिले काम में कोई ज्यादा हर्जा नहीं था. इधर उर्मिला तब तक 12 वीं पास कर चुकी थी और उसके घरवालों की आगे पढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. खुद उर्मिला का भी पढाई में कोई खास इंटरेस्ट नहीं था. वो डॉ. कुमार के घर में इस कदर सहज हो चुकी थी कि उसका अपने घर से ज्यादा वक़्त यहीं बीतता था. कहना ग़लत नही होगा कि इस घर के साथ उर्मिला का जैविक रिश्ता बन चुका था. वो इस घर में रमेश की सीनियर भी थी. शुरू में रमेश को इस घर और खासकर परिवारवालों के साथ एडजस्ट करने में दिक्कत हुई थी और उसे हर रोज़ किसी न किसी बात पर डांट खानी पड़ती थी. पर धीरे धीरे वो भी इस घर के लिए अपरिहार्य सा हो गया था.

तो इस घर के तीन लोगों के साथ दो नौकरों का जीवन झील के पानी की तरह स्थिर चल रहा था. कोई खास हलचल नहीं. रोज़मर्रा के तयशुदा काम. उन्हें तयशुदा तरीकों से निपटाना. बेशक पाँचों एक साथ नहीं बैठते थे पर थोडा थोड़ा एक कुनबे की तरह दिखने लग गए थे. अब रमेश और उर्मिला भी रात होते होते ही इस घर से निकलते थे और जल्दी सुबह इस घर में वापस आ जाते थे. उन दोनों के अपने घर रात बिताने की सराय से हो गए थे. इस घर के तीनो लोगों की दिनचर्या बहुत तय शुदा थी. बिलकुल समय सारणी में बंधी. विपिन ही उनमें ऐसा था जो घर के काम से कभी कभार बाज़ार निकल जाया करता था पर आजकल तो वो भी बाहर का काम रमेश के सर डालने की कोशिश में रहता था.उसे अपनी कविताओं से फुर्सत नहीं थी. उसके कुल दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे पर इस बात को बरसों हो गए.उसका दूसरा संग्रह भी प्रकाशित हुए 15 बरस हो गए थे. ऐसा लगता था कि उसे कविताएं लिखने में ही रूचि रह गयी थी छपवाने में वो कम विश्वास करने लगा था.

1 comment:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन फिरोज गाँधी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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