Friday, November 24, 2017

कैलकुलेटर

आजकल जो कैलकुलेटर उसे चीप प्लास्टिक का टुकड़ा नज़र आता था उसने उसे बरसों पहले कितना छला था! दुनिया में हो सकता है ये कैलकुलेटर सदियों पहले आ गया हो, उसने उन दिनों उसे पहली बार देखा था. वो शायद छठी या सातवीं में पढता था. क़स्बे का सिनेमाघर उसके घर से दूर था. सिनेमा लेकिन उसके दिल के करीब था. वो रोज़, चला कर पास की दर्ज़ी की दुकान तक ज़रूर जाता था. इस दुकान में सिनेमा के बेशुमार पोस्टर चिपके रहते थे. इनमें से कुछ पोस्टर क़स्बे में फिल्म लगने के लिहाज़ से बदलते भी थे.बाकी कई पोस्टर सदाबहार थे.कुछ कालातीत भी थे, बरसात के राजकपूर नर्गिस टाइप. अक्सर जो फिल्म सिनेमाघर में लगी होती थी उसका पोस्टर उस दुकान में भी चिपक जाता था. शायद ये कोई विज्ञापन जैसा तरीका था या उस दुकान वाले का सिनेमाघर वाले से कोई निजी रिश्ते जैसा मामला. जो भी हो ये तय था कि टेलर मास्टर भी फिल्मों का शौकीन था. दुकान में किसी कोने में पड़ा रेडियो विविधभारती के गाने हर वक्त चलाता रहता था. ‘वो’ उस ‘नोवेल्टी टेलर’ की दुकान के बाहर कुछ देर खड़ा रह कर फिल्मों के पोस्टर देखता रहता था. पोस्टर उसे क़स्बे में और भी कई जगह चिपके दिख जाते थे पर ये जगह उसके घर के नज़दीक थी.
पढाई में वो ख़ुद जैसा भी था, पढने का तरीका सबका एक जैसा था. किताबें पढ़ना, गृहकार्य करना, गुणा भाग, पहाड़े वगैरह. कलम और दवात के अलावा ब्लैक बोर्ड और खड़िया.
खड़िया का चूरा पूरी क्लास में उड़ता रहता था. उसने तब तक कैलकुलेटर जैसी चीज़ के बारे में सुना भी नहीं था. बल्कि सोचा भी नहीं था कि कोई ऐसी भी चीज़ हो सकती है जो गणित के गणनाएँ इस तरह हल कर सकती हैं. शकुंतला देवी के बारे में अलबत्ता उसने ज़रूर कहीं पढ़ा था और उसे बड़ी हैरत हुई थी कि कोई ऐसी महिला है जो गणित के लम्बे लम्बे गुणा- भाग बिना कॉपी- पैन के दिमाग में सोच कर हल कर सकती है और वो भी तत्क्षण ही.
कैलकुलेटर आज तकनीक में कोई ख़ास दर्ज़ा भले ही नही रखता मगर उन दिनों जब उसने पहली बार ऐसी चीज़ को देखा था उसका दिल दूना धड़कने लग गया था. उसे वो दृश्य आज भी याद था. चारों तरफ बारीक धूल थी. इक्का दुक्का पेड़ आस पास थे. वो अपने दोस्त के साथ वहां खड़ा था. उसका दोस्त बड़े इंजीनियर का बेटा था. उन दोनों में हलकी फुलकी दोस्ती थी. उस वक्त आस पास कोई नहीं था.उनके चरों ओर काफी खाली जगहे थीं. ऐसा लगता था वो पूरा परिदृश्य ख़ालीपन से भरा था. आसपास के इक्का दुक्का पेड़ों के बीच भी खूब सारी खाली जगह ठुंसी हुई थी. आसपास में उड़ते एकाध परिंदे को देखने के लिए भी कई मीलों खाली जगह को लांघना पड़ता. वो वहां क्यों था ये उसे अब ठीक ठीक याद नहीं था. तभी वहां ओवरसियर आया जो उसके दोस्त के पिताजी का मातहत था. उसने वहां आकर सीधे उसके दोस्त की ओर ही देखा और अपने जेब से कैलकुलेटर निकाल लिया. उसकी नन्ही से स्क्रीन खाली थी. ओवरसियर ने एक बटन दबाया. ध्वनि का एक मीठा सा अंश बज गया और स्क्रीन रोशन हो गई. फिर उसने दोस्त को जोड़, बाकी, गुणा भाग सब उससे करके दिखाए. उसका दोस्त रोमांचित सा उसे देख रहा था. फिर ओवरसियर ने कैलकुलेटर उसके दोस्त को थमा दिया और कहा ख़ुद करके देखो. उसका दोस्त तकनीक के उस चमत्कार से चमत्कृत था. वो स्क्रीन पर उभरते अंकों को विस्फारित नेत्रों से देख रहा. उसके कांपते हाथ उस पर धीरे धीरे चलने लगे. ओवरसियर का ध्यान उसके दोस्त की ख़ुशी पर ही केन्द्रित था और वो.. वो अपने दोस्त को इस तरह देखकर अजीब से तनाव में ऐंठता जा रहा था. वो अपने दोस्त की ख़ुशी में शरीक नहीं हो पा रहा था. वो उस कैलकुलेटर को अपने हाथ में लेने के लिए मचल गया. वो उस चमत्कार को खुद अपने हाथों से करना चाह रहा था. वो देर तक ‘एक बार मुझे, एक बार मुझे कहता गया पर उसकी चिरौरियों और मिन्नतों पर न तो उसके दोस्त ने कोई ध्यान दिया और न ही उस ओवरसियर ने. आखिर ओवरसियर कुछ देर बाद उस कैलकुलेटर को जेब के हवाले कर चलता बना. उस ओवरसियर के लिए वो वहां जैसे मौजूद ही नहीं था.
उसे याद है वो वहां से अपने घर तक डूसके भरता रोता ही रहा. उस वक़्त कोई भी भगवान उसके इस मौन करूण विलाप से पसीज सकता था. पर उसका रोना कीमती था. और उसने इस सम्पदा को किसी के सामने उदघाटित नहीं किया. कई दिनों तक उसकी सपनों में कैलकुलेटर की नन्हीं सी स्क्रीन चमकती रही. वो एक दम से जागकर उठ बैठता. सपने में अचानक कैलकुलेटर चमक उठता और उसे वो चमक फ़्लैश लाइट की तरह चौंध मारती लगती. उसकी मां उसके इस तरह अचानक जागने से घबराने लग गई. वो किसी बुरे सपने के बारे में पूछतीं और वो मना कर देता.
.............................................................
‘तो.. फिर क्या हुआ? आओ तुम्हें दुनिया का सबसे महंगा सेल फ़ोन दिला देती हूँ. उसमें कैलकुलेटर भी होगा. किसी भी डिजिटल स्टोर में चलो और तुम नाम लो वो चीज़ तुम्हारी हो जाएगी.’ बरसों बाद उसकी प्रेमिका ने कहा.
‘मेरे लिए कैलकुलेटर शायद इतना मायने नहीं रखता. तब भी नहीं जब मुझे उसके सपर्श से महरूम किया गया था. मेरे बाप ने मेरे अगले जन्मदिन पर ही वो ला दिया था.’
‘फिर दिक्क़त कहाँ थी ?’
‘वो मेरी प्रतिक्रिया शायद कैलकुलेटर को लेकर उतनी नहीं थी. मेरे पिताजी ने जब मुझे कैलकुलेटर लाकर दिया तो मुझे ज्यादा ख़ुशी नहीं हुई थी.’
‘तुम ही तो उसके लिए कहते थे- चीप प्लास्टिक शिट.’
‘हां.. पता नहीं..शायद वो शायद ओवरसियर के लिए था.’

Friday, November 10, 2017

मून फ्लोरिस्ट

वो जब भी इस दुकान के आगे से गुज़रता, हल्का सा ठिठक जाता.. और सोचने लगता कि चाँद पर उगने वाले फूल किस तरह के होते होंगे. उनका रंग क्या धरती पर उगने वाले फूलों जैसा ही होता होगा? क्या उनमें भी वैसी ही आभा होती होंगीं जैसी यहाँ के फूलों में होती हैं? चाँद की मिट्टी की तासीर वहां के फूलों में किस तरह से आती होगी?

चाँद पर फूल चटख ही होते होंगे, इतना उसे भरोसा था.

वो दुकान उसके दफ़्तर के रास्ते में थी. दुकान फूल बेचने वाले की थी और उसकी दुकान के साइन बोर्ड पर चाँद के अर्ध वृत्त में लिपटा कोई आकाशीय फूल था. ऐसा फूल उसने कभी देखा नहीं था. वैसे भी उसने ज्यादा फूल नहीं देखे थे. फूलों के बारे में उसकी जानकारी उतनी ही थी जितनी एनीमेशन देखने वाले बच्चे की  कंप्यूटर ग्राफ़िक्स में. वो फूलों की किस्मों को पहचानता नहीं था. लोगों को जब वो फूलों के बारे में बात करते सुनता, वो मन ही मन हैरत करता.

वो कहीं न कहीं फूलों की बात को नफ़ासत से जोड़ता था. वो एक नफ़ीस आदमी नहीं है ऐसा फैसला वो अपने ही खिलाफ़ सुना देता. यद्यपि उसे फूल अच्छे लगते थे. वो फूलों से प्यार करता. उसे बच्चे फूल से लगते. और उसने अपनी प्रेमिका का एक सुन्दर फूल ही दिया था. गुलाब का. पर इसमें कोई दिक्कत नहीं थी. उसने प्रेमिका को फूल देने से ज़्यादा ‘गुल-ज़बान’ में उससे कुछ कहा था. ये फूल से ज्यादा कोई लिपि थी. फ्लोरी- स्क्रिप्ट.

वो फूल को बेशक कम जनता था पर उनके ज़रिये जिस भाषा में कहा जाता था उससे वो वाकिफ था. वैसे भी जब फूल खूबसूरती से ज्यादा वर्णमाला बन जाए तो उनके जाति- कुल की परवाह कौन करता है!

दुनिया भर में प्रचलित भाषाओं और उनकी लिपियों से इतर उसे इस तरह की भाषाओं और वर्णमालाओं का ठीक ठीक ज्ञान हो गया था. वो गंध की लिपि पहचानने लग गया था. बावजूद इसके वो अपने आपको अधूरा महसूस करने लगता. इस दुकान के सामने से गुज़रते उसे हर रोज़ नए तरह के फूल नज़र आने लगते. नवीन रंगों में लिपटी कोमलताएं.बस वो किसी पर भी अपनी तरफ से ‘नेम टैग' नहीं लगा पाता. वो झुंझला जाता. क्या उसे फूलों की आज तक कायदे से पहचान नहीं हुई है या जेनेटिक सम्मिश्रण ने नित नए फूलों का अविष्कार कर उसे चिढाने का नया फोर्मुला तैयार किया है.वो बड़ी मेहनत से इनसाइक्लोपीडिया देखता और समझने की कोशिश करता पर जैसे ही कोई ताज़ा फूल उसके सामने आता उसके सामने अपरिचय का गाढ़ा वीराना पसर जाता. बचपन में देखे फीके रंगों वाले पांच फूल ही उसकी स्मृति का स्थाई हिस्सा बने रहते.

उसे लगता ये ‘मून फ्लोरिस्ट' रात को कीमियागरी से नई नई किस्मों के फूल खिला देता है और सुबह अपनी दुकान में सजा देता है. ये रंग ही थे जो उसे परेशान करते थे. वो फीके धूसर रंगों से वाकिफ था पर चटख रंग उसके ज्ञान को चुनौती देते. वो रंगों के शेड्स से परेशान हो जाता. रंगों के शेड्स उसे गणित की टेबल्स से लगते जिन्हें याद करना मुश्किल था. कई सारे रंग उसे बीजगणित की जटिल वीथियों में ले जाते.




आखिर उसने हार कर सोचा वो भाषा का आदमी है. गणित उसके बस की नहीं. पर ‘मून फ्लोरिस्ट' के सामने से गुज़रने पर कई दिनों तक वो ठिठक ज़रूर जाता था.

Saturday, October 28, 2017

लोहे का फ़ाटक


वो हाथ में थैला लिए क़स्बे की एक बड़ी किराणा शॉप की ओर बढे जा रहा था. उसके घर से ये कोई एक किलोमीटर के फासले पर थी. रास्ते में भीड़ भाड़ या ट्रैफिक की कोई समस्या नहीं थी. उसे पता था थोड़ा समय लगना था इसलिए वो अपनी धुन में चला जा रहा था. ये शाम के झुटपुटे का समय था चीज़ें वैसी नहीं दिख रहीं थीं जैसी वे खिली धूप के सम्पूर्ण आलोक में दिखा करतीं है. दिन में बाज़ार जाते वक्त वो इस क़स्बे में ख़ूब गर्दन घुमा घुमा कर दूर तक देखा करता है. शर्तिया अपनी लैंडस्केप पेंटिंग्स में ये क़स्बा बहुत खूबसूरत दिखाई  देता होगा. एक तरह ऊंचे पहाड़, बबूल की कंटीली हरीतिमा, रेतीला विस्तार और मिट्टी की दीवारों से घिरा तालाब. गहराती शाम में क़स्बा उसे धुंए में लिपटा लग रहा  था इसलिए दूरस्थ दृश्यों के बजाय उसका ध्यान सिर्फ अपने आसपास ही था. आसपास भी क्या उसकी आँखें सिर्फ उसके चलते हुए पैरों को ही देख रही थी. उसे लगा सिर्फ एक जोड़ी पैर ही चले जा रहे थे.  कुछ कुछ चमकते हुए.वो कुछ और दिलचस्पी से अपने गतिमान पैर देखने लग गया. उसे उनमें गंतव्य तक पहुँचने की बैचैनी भी दिख रही थी. चलते हुए पैरों के बराबर एक साया भी साथ का साथ चल रहा था. उसका अपना साया. वो अब अपने ही साए को भी चलते हुए देखे जा रहा था. वो अपने दिमाग से चुहल करता सोच रहा था कि अपनी ही परछाईं क्या होती है! एक इंसानी आकृति. जिसका कोई अपना व्यक्तित्व नहीं होता. भावहीन. कोई ख़ास चेहरा नहीं. मूक. खामोश.  तभी उसे लगा एक और साया भी ठीक बराबर चला जा रहा है. उसे कुछ कुछ अंदाज़ा था इसलिए चौंकने की ज़रुरत नहीं थी. उसका दिमाग अपनी चुहल से हट कर उस पर सोचने लग गया जो इन दिनों उसके साथ हो रहा था. एक लड़की जिसे वो जानता था आजकल ज्यादा नज़र आने लग गई थी. एक लड़की थी जो उसके आस पास ही रहती थी. एक लड़की जो उसके और दूसरे लड़कों के साथ तो नहीं पर नज़र आने की दूरी पर अपनी सहेलियों के साथ ही खेला करती थी.

उसे पता था ये बराबर चलती परछाईं पदम ही हो सकती है. घर से बाहर निकलते ही इन दिनों  शायद ही ऐसा हुआ हो कि पदम उसे आसपास न दिख जाए. वैसे वो उसके घर के बिलकुल पास ही रहती थी, पर उसका मन उसकी उपस्थिति से अनजान रहता था. पर कुछेक दिनों से न जाने ऐसा क्या था कि वो उसके दिन के परदे पर कई बार अलग अलग जगहों पर अपने उपस्थिति बिंदु अंकित कर जाती थी.

एक सामानांतर चलते साए का संभावित नाम जानते हुए  भी तस्दीक के लिए उसने  तुरंत मुड़ कर देखा. पर ये कोई और था. उसने एक गहरी सांस ली.

उसके पिता सरकारी कर्मचारी थे और उन्हें रहने के लिए दफ्तर की तरफ से एक मकान इस  सरकारी कॉलौनी में मिला हुआ था. कॉलोनी में घर पुराने, ढालू छतों वाले घर थे. संख्या में वे ज्यादा नहीं थे. दफ्तर भी उसी कॉलोनी में बीचों बीच था जो एक विशाल पथरीले जानवर की तरह पसरा हुआ था. ये जाने कौनसा सरकारी महकमा था जहां इतने कम लोग काम करते थे. हालांकि कुछ मुलाजिम कॉलोनी से बाहर अपने खुद के घरों में भी रहते थे. घरों से बाहर किसी तरह की सड़कें और गार्डन नहीं. बस कच्चे रास्ते, रेत और आक, नीम, बबूल और बेशुमार खाली जगहें. यानी थोड़े से घर, एक दफ्तर और पेड़ झाड़ियों से भरा खालीपन. एक तारबंदी का एक विशाल घेरा उस कॉलोनी की सीमा तय करता था. उस तारबंदी के बाहर पूरब की तरफ रेतीला मैदान था जहां हर छह महीने में फौजियों के कैंप लगते थे. ये इलाका अंतर्राष्ट्रीय बार्डर के नज़दीक था. जब फौजी कैंप नहीं करते थे तो घुमंतू जातियों के लोग अपने गधों समेत वहां डेरा डाल देते थे. कुछ दुबले पर फुर्तीले कुत्ते भी उनके साथ होते थे. उसके अलावा बाहर ज़्यादातर बियाबान था.

कॉलोनी के बाहर पूरब की तारबंदी वाले इस हिस्से में उसे जाने में इन दिनों थोडा डर भी लगने लगा था. असल में उसने पिछले दिनों एक घुमंतू  को फेंस से एक बकरे को बांधते देखा था. वो समझ पाता उससे पहले ही तलवार के त्वरित प्रहार से बकरे की गर्दन धड़ से अलग होकर फेंस से झूल गयी थी. उसने देखा थोड़ी दूर से ही था ये सब, पर उसे डर लगने लग गया. रक्त का लाल रंग और उसका वेग बहुत अलग था. इससे पहले उसने ऐसा कभी देखा नहीं था. वो वहां से रवाना होता उससे पहले ही आक की झाड़ी में एक सरसराहट हुई. और उसकी आँखों के सामने पदम थी. उसके चेहरे पर किलोल के भाव थे. आँखों में शरारत साफ़ पढ़ी जा सकती थी जैसे ये सब उसने ही स्टेज किया हो.
“त..तुमने देखा अभी अभी…” वो सिर्फ़ इतना ही बोल पाया और पदम से उसके बेहद कम और दुर्लभ संवादों में से ये भी एक था.
उसके चेहरे पर खौफ देखकर तुरंत वो गंभीर सी हो गयी. खेल और शरारत उसके चेहरे से जाते रहे. वो इस तरह उसके पास आ गई जैसे वो उससे उम्र में बहुत छोटा हो. हकीकत में जबकि वो उससे कुछ बड़ा ही था. पदम् के पास आने से उसका डर जाने लगा. पहले तो उसे लगा उसे खौफ में उसने पकड़ लिया है और ये बात वो बाकी लड़कों को बताकर उसका मजाक बनाने वाली है. पर उसके चेहरे पर संजीदगी ने ये दिलासा कि वो ऐसा कुछ नहीं करेगी बल्कि फ़िलहाल उसे इस दहशत से बाहर निकलेगी. ज़ाहिर बात थी कि पदम के लिए ये कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी. वो सुन चुका था कि खास मौकों से पहले पदम के पिता नारायण जी क्वार्टर के पिछवाड़े में बकरा बाँध आते थे. नारायण जी इसी दफ्तर में ड्राईवर थे जिसमें काम करने वाले लोग इस तारबंदी वाली कौलोनी में रहते थे. वो लम्बी मूंछो वाले थे और उनका चेहरा निर्भाव था. वो गुस्से में है या उनका मूड ठीक है ये कहना मुश्किल था. कॉलोनी के बच्चे जब खेल रहे होते तब वो कई बार बेवजह ही उन पर चिल्लाने भी लग जाते. और कई बार उनके घर में गेंद जाने पर जब किसी कि हिम्मत उनके घर में जाने की नहीं होती थे, वे गेंद के साथ बाहर आकर बच्चों के साथ खेलने भी लग जाते.
ये कॉलोनी एक उनींदे क़स्बे का हिस्सा थी पर उसकी मुख्य बस्ती से थोड़ी बाहर की तरफ थी.क़स्बा सोता जल्दी था और देर तक सोता रहता था.पाकिस्तान से सटे बॉर्डर के पास स्थित होने से इस क़स्बे में कई हिन्दू शरणार्थी विभाजन के बाद अलग अलग लहरों में यहाँ आकर बस गए थे.उनका अपनी ज़मीन  से निष्क्रमण पास स्थित किसी प्राचीन देवभूमि पर बसने के लिए नहीं था जहां उनके पूर्वजों को मोक्ष मिल सके बल्कि वे बेहद तकलीफ में थे और अपनी जड़ों से उखाड़  लिए गए थे और कहीं भी आसरा और दो वक्त की रोटी तलाश करते यहाँ आ गए थे.वे अपने बच्चोँ के भविष्य को अच्छा देखना चाहते थे इसलिए यहाँ आते ही सम्मानजनक रोज़गार की जुगत में लग गए. उनका जीवत और जज्बा अदभुत था.  

        कस्बे में एक तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ थे तो दूसरी तरफ रेत के टीलों का दूर तक फैला विस्तार था. रेत के विस्तार में कई प्रेम कथाएँ थीं तो पहाड़ में पौराणिक चरित्रों के किस्से गूंजते थे. पांडवों का अज्ञातवास, भीम की भुजाओं में तुलती शिलाएं, अर्जुन के बाण से बना कूप. और न जाने क्या क्या.पहाड़ों में एक प्राचीन तालाब और उसमे पड़ा हरा पानी कुछ कुछ जादुई लगता था.
उसका अपना घर यहाँ से कोई सौ पचास किलोमीटर की दूरी पर एक शहर में था जहा वो छुट्टियों में घरवालों के साथ जाया करता था.वैसे होश सँभालने से लेकर अब तक उसने अपने को इस कसबे में ही पाया है और शहर में उसका घर असल में उसके पिता और उनके पिता और फिर उनके पिता का था. उसका घर इस सरकारी कॉलोनी का घर ही था. लेकिन क्या असल था और क्या काल्पनिक कहना मुश्किल था. उसे इस कॉलोनी में रहना सपने सा लगता था. जहां मन की, मर्जी की की जा सकती थी या उसके बारे में सोचा जा सकता था. जहां अचानक छुप कर दुनियां से गायब हुआ जा सकता था. और शहर में पिताजी के घर में कुछ दिन रहना बहुत ठोस और खुरदरा सा लगता था. उसके कज़न्स उससे एक दूरी बनाकर रखते थे. वे अपनी किताबों को उसे हाथ लगाने नहीं देते थे. खिलौनों से खेलने की उम्र रही नहीं थी. और महल्ले के खेल उसके लिए कुछ अलग तरह के थे. उनमें ताश शामिल होती थी. उसे ताश से हद दर्जे की बोरियत थी. उसे लगता था शहर में जाकर झट से किस्से कहानियों के किताबे खरीद कर वो लौट आए.
उसे कॉलोनी में बड़े नीम पर चढ़ने की याद आती रहती. नीम की सबसे ऊंची प्रत्यास्थ डाल पर लटक कर वो वापस ज़मीन पर कूद जाता था. नीम पर फुनगी से कुछ ही दूरी तक वो चढ़ जाता और वहां से किसी चिड़िया के घर में झांकना उसे एक सुख से भर देता. फिर वहां से डाल पर रेंगता वो सबसे अंतिम सिरे पर पहुचकर धप्प से ज़मीन पर कूद जाता.कॉलोनी के उसके दोस्त भी उसके साथ ये खेल खेलते.  
कॉलोनी में पांच सात लड़के हम उम्र थे. और दो तीन लडकियां थी. लड़के अलग खेलते, लडकियां अलग. उसे लगता जब लड़के खेलते थे तो वे दुनिया की नज़रों में नहीं होते थे. घर वालों में एक खास तरह की बेफिक्री उन्हें लेकर रहती थी. सब एक दूसरे को जानते थे और उनमें कामचलाऊ घरेलू व्यवहार और रिश्ते थे. ये सहजीवन जैसा नहीं था पर बीच में साझापन था. लड़के लड़कियों में ज्यादा घुलने मिलने को लेकर सख्त नियम जैसे नहीं बना रखे थे बस एक अलिखित सा समझौता उस जगह स्थापित था कि लड़के लड़के अलग रहेंगे और लड़कियां अलग. सब जानते थे कि कभी कोई बात हुई तो उसे बढ़ने से पहले ही ख़त्म कर दिया जायेगा.

अक्सर उस क़स्बे में बाहर से मदारी जादूगर आते थे। उनका मजमा जब भी लगता वो गाँव के कौतुहल का केंद्र बन जाता। इन दिनों फिर कोई मदारी अपने साथ जमूरे और बन्दर के साथ आया हुआ था। भीड़ का वर्तुल उसके चारों ओर था। वो अपने हाथ में किसी जानवर की खोपड़ी में देखते ही देखते आग लगा देता। बन्दर से करतब करवाता। और आखिर में जमूरे से मजमा देख रहे लोगों से फीस वसूल करवाता। वो भी इस मजमे का हिस्सा था। कुछ ही देर में जब उसने भीड़ में पदम् को भी वहीं देखा था उसका ध्यान मजमे से बार बार हटने लगा। पदम का ध्यान भी उसकी ओर गया। वो अब बीच बीच में एक दूसरे की ओर देख रहे थे। मजमा से उनका ध्यान एक दूसरे पर जाने लगा। पूरी भीड़ सिर्फ मदारी को देख रही थी पर वे मदारी के सम्मोहन से आज़ाद हो गए थे। उसे लगा इससे ज़्यादा एकांत में उसने पदम् को इससे पहले कभी नहीं देखा था। पदम् को अकेले में देखने पर उसे लगा वो बहुत खूबसूरत थी. क्या वो भी उसके बारे में ऐसा ही कुछ सोच रही होगी? ये सवाल उसने उस वक्त नहीं बरसों बाद अपने आप से पूछा था।




इस तरह के मज़मे बड़े एंटी क्लाइमेक्स पर ख़त्म होते थे। जिस ख़ास जादू को दिखाने का दावा मदारी करता था वो कभी दिखाया नहीं जाता। वो पहले ही उस भीड़ से सरक गया।  




ये छुट्टी का दिन था. सर्दी का दिन दुपहर तक चढ़ गया था फिर भी बाहर कोई हरकत नहीं लग रही थी था तो ये आम छुट्टी के दिन की तरह ही,नया कुछ नहीं, पर इसमें बड़ा अकेलापन था.उत्तर से रह कर सर्द हवाएं हड्डियों की मज्जा तक को जमा रही थीं. उसने स्वेटर, कोट सब पहन रखा था पर शरीर ठण्ड से फिर भी ऐंठा जा रहा था. न जाने क्यों आज कॉलोनी का कोई लड़का बाहर नहीं था.वो अकेला कोलोनी के फाटक के पास जाकर खड़ा हो गया.तीन तरफ से कॉलोनी को तारबंदी घेरे थी पर दफ्तर के सामने वाले हिस्से में छ सात फीट ऊंची करीब पचासेक फीट लम्बी पक्की दीवार थी जिसमें ये फाटक जड़ा था.अब जंग खा चुका ये फाटक खुला ही रहता था.वो फाटक के पास खड़ा कुछ देर ऐसे ही अन्यमनस्क खड़ा रहा. फिर इस इरादे इसे कि फाटक से होता दीवार पर कहीं बैठ जायेया, फाटक के ऊपर चढ़ने लगा. फाटक बरसों से बिना दबाव और भार झेले ऐसे ही खड़ा था पर वो उस मुद्रा में तभी तक खड़ा रहने की जुर्रत कर सकता था जब तक कि उस पर कोई बोझ न पड़े. असल में वो इशारे से ही दीवार से बंधा था. तो फिर लोहे के फाटक में में बीच के खाली स्थानों में अपनी उँगलियाँ फंसाए वो चढ़ने की कोशिश में ही था कि अचानक फाटक का वो दरवाज़ा उसे साथ लेता, उसे ज़मीन पर गिराता उसके ऊपर गिरा.वो चित्त था और फाटक उसकी कमर से उसे दबोचे हुए था. वो चिल्लाता उससे पहले उसने पदम को उसकी ओर भागते हुए देखा. उसने फाटक को पूरी ताकत लगाते हुए थोडा ऊपर किया वो रेंगता फिसलता बाहर आ गया. फाटक का वज़न हटने पर भी उससे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था.पदम ने उसे सहरा देने कि कोशिश की तो वो लुढ़क कर सीधा हो गया.अब उसे उठाकर सीधा करने की कोशिश में पदम ने उसेक दोनों हाथ पकड़ लिए.वो थोडा उठा और पदम को अपने साथ लेता धप्प से फिर गिर गया.पदम उसके ऊपर गिरती उससे पहले उसने हाथ से उसे रोक लिया.उसकी हथेली पर पदम की छाती टिक गयी.बस इसी क्षण दोनों की नज़रें मिलीं. और... पदम तेज़ी से भागने लग गयी.  पिछले कुछ दिनों से दोनों के बीच दोस्ती जैसा होने वाला हो रहा था पर इस अजाने स्पर्श ने दोस्ती के स्थाई रासायनिक यौगिक को बनाने की जगह एक बहुत बेचैन, तप्त और विस्फोट की संभावनाओं से युक्त किस अपरिभाषित से पदार्थ को जन्म दे दिया था.वो कुछ मुश्किल से खड़ा हो पाया फिर धीरे धीरे चलता हुआ घर की ओर रवाना हो गया. उसकी कनपटियाँ लाल हो चुकीं थी.सर बुखार में तपने लग गया और बाकी धड़ ठण्ड से कांप रहा था. घर पहुँचते ही सीओ सीधे रसोई में भागा. उसे लगा दुनिया में सबसे नर्म और गुनगुनी जगह रसोई होती है.




उसके बाद पदम उसे आने वाले कई दिन नहीं दिखी. कई दिन बाद वो दिखती और गायब हो जाती. वो दिखती तो भी उससे अनजान ही नज़र आती. वो जानबूझकर उसके दिखने के ठिकानों के आसपास मंडराने लगा. उसके घर के पिछवाड़े, खेलने की जगहों, उसकी दोस्त हेमी के घर के आसपास.सब जगह. पर वो कहीं नहीं दिखती. कोई इस तरह से भी ग़ायब हो सकता है! वो सोचता. ये तय था कि वो अपनी मर्जी से सामने नहीं आ रही थी. उसेक घर वाले उसे घर में नहीं रखे हुए थे. उसका कारण एक तो उन दोनों के बीच अब तक कोई रिश्ता था ही नहीं और जो था वो सद्यःजात, अद्वितीय, रंग-गंध-नामहीन, बेचेहरा, और प्रतिपल परिवर्तित होने की संभावनाओं से भरा था. ये रिश्ता अगर था भी तो दिलासा देने वाला नहीं, बेचैन करने वाला और लगभग डराने वाला था.






            ---------------------------------------------------------------------------








वो फिर इसी कॉलोनी में था.बरसों बाद. उसके पिता यहीं से रिटायर हो रहे थे. उसके पिता ने तबादले के बारे में कभी सोचा नही नहीं. वो और भाई बहन सब शहर पढने चले गए फिर और जगहों पर नौकरी करने या उसकी खोज में जाते गए पर उसके माता पिता इसी कोलोनी के घर में रहे. अब पिताजी के रिटायर्मेंट का समय था. उसके बचपन और तरुणाई के इस घर ने कितने ही वसंत देखे थे.

वो कॉलोनी के रेतीले रास्तों पर घूमने लगा.
नीम का सबसे ऊंचा पेड़ ग़ायब था. उसे लगा उसे उसकी स्मृतिओं के लोक से अपदस्थ कर दिया है. वो लोहे का फाटक जिसने उसे उसके जीवन के पहला कोमल सम्बन्ध दिया था अब भी वहीं था पर उस पर पेंट हो चुका था और वो इतना मजबूती से दीवार में जड़ा था कि अब वो किसी पर गिर नह्नीं सकता था. उसने सोचा, कुछ चीज़े जो गिर नहीं सकतीं कितनी सख्त और निष्ठुर होती हैं!

स्मृतियों के धुंधला होने से पहले आप उन्हीं जगहों पर जाएं जहां वे जन्मी थीं तो वे फिर से चटख हो जाती हैं। वो फिर उन्हीं ठिकानों पर जाने की सोचने लगा, पर ठहर गया।
मेला ही तो था ये सब। मेले में जाना अच्छा लगता है। अगले दिन फिर जाते है। आखिर एक दिन मेला अपने माल असबाब सहित कहीं ओर चला जाता है। रह जाता है एक खाली रेतीला मैदान। वो समय भी जा चुका था सिर्फ उसकी केंचुल पड़ी थी. रेत घड़ी में रेत नहीं फिसलती समय फिसलता है। वही रेत कांच के बर्तन में पड़ी रहती है। वक्त कहीं चला जाता है।   

  

Tuesday, September 12, 2017

तीन और दो पांच लोग


ये घर था तो शहर के लगभग बीच में, पर शहर से दूर था.
शहर के तमाम व्यस्त रास्तों के बगल से गुज़रने के बावजूद वो घर शहर की गिरफ्त से दूर था.
घर के चारों और ख़ूब सारे पेड़ और झाड़ियाँ थीं. आस पास कुछ और बड़े बंगले थे जिनमें लम्बे चौड़े लॉन और पार्किंग स्पेस थे. इन सबने कुछ ऐसा माहौल बना दिया था कि यहाँ शहर का शोर धीमा और दूर से आता सुनाई देता था. जैसे यहाँ पहुँचने से पहले किसी आवाज़ सोखने वाले अस्तर से छन कर मंद हो जाता हो. वो अक्सर  नास्टैल्जिया में बजने वाले किसी राग की तरह बजता हुआ लगता था.




इस घर में तीन लोग रहते हैं. डॉ. हिम कुमार, उनकी पत्नी लीना कुमार और बेटा विपिन.
डॉ कुमार की उम्र ज्यादा है.सक्रियता को देखते हुए उनके बारे में बहुत आशावादी तरीके से सोचा जा सकता है कि वे अपनी ज़िन्दगी का सैकड़ा पूरा कर सकते हैं. उनको रिटायर हुए बरसों हो गए है. कभी वे शहर के नामी डॉक्टरों में गिने जाते थे. इस शहर में, और शहरों की तरह ही डॉक्टरी को किसी ज़माने में बेहद अभिजात्य पेशा माना जाता था. अभी भी माना जाता है पर अब.. काफ़ी फ़र्क भी आ गया है.

डॉ.हिम कुमार के सेवाकाल में शहर में गिने चुने ही डॉक्टर हुआ करते थे. और हर डॉक्टर कभी न कभी एक्स महाराजा का इलाज करने पैलेस में हाज़री दे चुका होता था.पैलेस से बुलावा आने पर डॉक्टर सारे काम छोड़कर स्कूटर से महाराजा साहब के निवास की ओर रवाना हो जाता. इसमें डिपार्टमेंट की भी मूक सहमति सी होती. क्योंकि विभाग ने इसका कभी संज्ञान उस तरह से नहीं लिया. शाही पैलेस में डॉक्टर हिज हाइनेस के परिवार की मेजबानी का सुख भोगता.

डॉ. हिम सरकारी डॉक्टर थे और घर में भी प्रैक्टिस करते थे. उनके ज़माने में शहर में तीन ही डॉक्टर थे जिनका नाम हुआ करता था. उनके  अलावा डॉ. माथुर और डॉ. भंडारी भी शहर की जानी मानी हस्तियों में गिने जाते थे.
डॉ.कुमार जब रिटायर हुए तो उन्हें लगा उन्हें इस शहर में याद रखने वाले कभी कम न होंगे. नए डॉक्टर उनके पास मार्गदर्शन लेने हमेशा आते रहेंगे. उनके जन्मदिन पर विश करने वाले सुबह से ही आने शुरू हो जाएंगे और फ़ोन तो रात 12 बजे तारीख बदलते ही घनघनाने लग जाएंगे. वे इस शहर के लिए हमेशा प्रिय बने रहेंगे. आखिर उनका जलवा लम्बे अरसे तक रह चुका था. पर रिटायर्मेंट के ठीक पांच साल बाद उन्हें इस शहर ने भुलाना शुरू कर दिया.और ये सब धीरे धीरे नहीं हुआ बल्कि एकदम से और लगभग झटके के साथ हुआ. जैसे इस साल बड्डे विश हुआ हो और अगले साल बिलकुल नहीं. जैसे इस बार मैरी क्रिसमस हुआ हो और अगली बार बिलकुल नहीं.जैसे सारा शहर एकदम से किसी दूसरे शहर में तब्दील हो गया हो. कायांतरण. किसी अजनबी, नामालूम शहर में.
क्या ऐसा हो सकता है कि शहर में किसी अजाने शहर का भूत घुस जाए? शहर के पत्थर, चट्टानें, रंग रोगन वही पर जैसे शहर कोई और ही हो. कौन ओझा बता सकता है कि इस शहर में फलाने शहरे का प्रेत है.कोई एक्ज़ोर्सिस्ट होता है क्या शहर में घुसी नामालूम शहर की शै जो खींच कर निकाल सके?
और तो क्या वजह हो सकती थी डॉ. कुमार को इस शहर द्वारा एकदम से भुला दिए जाने की?
तमाम तरह की विशेज़ का वॉल्यूम एक दम से कम हो गया. इस शहर ने उन्हें इतना जल्दी भुला दिया कि उन्होंने भी इस शहर में गुज़री पूरी ज़िन्दगी के बड़े हिस्से के बारे में सोचना भी बंद सा कर दिया. और उन्होंने इस शहर में रहते हुए भी अपने बचपन और तरुणाई के शहर ‘ल' को याद करना शुरू कर दिया जो इस शहर से बहुत दूर कहीं था. आजकल एक नया शौक उनके सर चढ़ा है.हल्का हल्का रेडियो बजाना.शौक  ज़रूर नया था पर प्यार पुराना था.रेडियो सुनना उनके बचपन का पहला प्यार था. बचपन में रेडियो से कुछ भी सुनना उनका जूनून हुआ करता था. घर में एक बड़ा सा रेडियो था जिसकी उपस्थिति बड़ी वज़नदार हुआ करती थी. आसपास कोई रेडियो किसी और के घर में नहीं था. उनका परिवार ‘ल' के बड़े अभिजात्य परिवारों में माना जाता था.उनके दादा अंग्रेजी, फ़ारसी और संस्कृत के विद्वान् थे. उन्हें अँगरेज़ सरकार से बड़े इनाम इकराम मिले हुए थे. रेडियो किसी के घर में होना इतनी बड़ी बात थी कि उनके घर को रेडियो वाला घर ख़ानदान कहा जाता था. उन दिनों के डॉ. हिम अपने कद से कहीं बड़े, ऊंचे और भव्य रेडियो को बड़ी हसरत भरी नज़रों से देखते थे और जब वो बजता था तो उसके आसपास ही घूमा करते थे.अब पॉकेट साइज़ के रेडियो से उनका उनका रिश्ता ज़रा अलग किस्म का है. इसके ज़रिये अब वे अपने शहर ‘ल' को एक नए कोण से देख पाते है. एक बजता रेडियो उन्हें अपने बरसों पुराने घर में ले जाने का काम करता है. कुछ बहुत उम्र का तकाजा और कुछ इन दिनों उनके स्वाभाव में उतर आई सनक के कारण वो रेडियो को कुछ कुछ जादू का डिब्बा मानने लगे हैं. उनके मुताबिक रेडियो पर अनजान देशों के प्रसारण ट्यून किये जा सकते है. रात को कई बार वो शोर्ट वेव पर अनजान भाषाओं के प्रसारण लगा देते. बहुत पक्के तौर पर तो नहीं पर कहीं न कहीं उन्हें ये अंदेश था कि रेडियो से कभी न कभी एलियंस के सन्देश सुने जा सकते हैं. उनका ये भी मानना था कि एलियंस कई बार अपने आने की आहट दे चुके हैं और हमने न जाने कितनी बार बल्कि हर बार उन्हें उन्हें अनसुना कर दिया है.




उनकी पत्नी डॉ. लीना भी बुज़ुर्ग है. वे डॉ.कुमार से पांच साल छोटी हैं पर दोनों पति-पत्नी की उम्र अब इतनी है कि दोनों बराबर के लगते है.बीमारियों के लिहाज़ से डॉ. लीना ज्यादा बीमार हैं. उनकी दिन भर की गोलियां बारह हैं, जबकि कुमार साहब पांच ही ले ते हैं. डॉ. कुमार को बुढ़ापे के आलावा कोई बीमारी नहीं है. डॉ. लीना भी बरसों पहले सरकारी सेवा से रिटायर हो चुकी हैं. वे सरकारी जनाना हॉस्पिटल में डॉक्टर थीं. उन्हें सेवा में रहते हुए भी डॉ. कुमार की पत्नी के रूप में ज्यादा जाना जाता था.इस शहर की होते हुए भी उन्हें लोग डॉ. लीना के रूप में कम ही जानते थे. कुछ बुज़ुर्ग लोग ज़रूर उनके पीहर के खानदान से वाकिफ़ थे पर ऐसे लोग बहुत गिने चुने ही थे. रिटायर मेंट के बाद डॉ. कुमार की तरह उन्हें भी शहर ने अपनी यादों से बुहार कर बाहर कर दिया. पर इसका उनको कोई ग़म नहीं था क्योंकि वे इसी शहर की थीं और डॉ. कुमार से प्रेम विवाह करने पर उन्हें उनके कथित अभिजात्य समाज ने जिस तरह तिरस्कृत किया था उसकी प्रतिक्रिया में उन्होंने अपने समाज और इस शहर दोनों को अपनी जुड़ाव-लगाव की तमाम किताबों से फाड़ कर फेंक दिया था.

डॉ.लीना मूलतः इस शहर की ही हैं इस बात को आज कोई नहीं जानता. और इस बात की किसीको परवाह भी नहीं हैं.

डॉ.दम्पति का बेटा विपिन भी अब अधेड़ उम्र का हो गया है. उसने शादी नहीं की ये कहना उतना ठीक नहीं होगा जितना ये कहना कि वो शादीशुदा नहीं है. विपिन के व्यवहार से लगता नहीं कि उसने शादी करने की कभी गंभीर कोशिश की होगी. उसे कविताएं लिखने में रूचि है.

डॉ.दम्पति को रिटायर हुए इतना वक्त हो गया था कि उन्हें अपने बिजी दिनों को याद करना पड़ता था.मरीजों की रेलमपेल के बीच हर वक्त काम में लगे रहना इतनी पुरानी बात हो गयी थी कि वो उनकी अपनी बात थी ये मानने में उन्हें खासा वक्त लग जाता था.रिटायरमेंट के बाद घर से बाहर निकलने का सिलसिला, दोस्तों-परिचितों के घर जाने का सिलसिला कुछ महीनों चलता रहा पर एक दिन डॉ.कुमार को समझ में आ ही गया कि घर से बाहर बाज़ार जाना थकने वाला काम है.दोस्तों के घर जाना एकतरफा काम है. वो लोग अब उनके यहाँ आने वाले नहीं है. गर्म जोशी में गिरावट इतनी जल्द थी कि इस अचानक आई बीच की ठंडक को डॉ कुमार महसूस करने लग गए थे.लिहाज़ा डॉ कुमार और डॉ लीना घर में ही सीमित हो गए. उन्हें देखकर कोई भी ये कह सकता था कि वे सेवानिवृति का जीवन जी रहे है. गाहे बगाहे कोई घर आता या पडौसी किसी बहाने घर आते और कमेन्ट करते कि आपने ख़ूब काम कर लिया अब घर में आराम से पसर कर आराम का वक्त है, या कि भाई आपके तो बड़े ठाठ है तो डॉ कुमार को असहनीय पीड़ा होती.पर वे कुछ बोलते नहीं.वे सोचते रिटायर्ड लाइफ का आराम ज़माने में एक कोम्प्लिमेंट की तरह कहा जाता है.भले उन्हें इस तरह के जीवन में मज़ा नहीं आ रहा हो पर क्या पता बाकी सब जिंदगी के इसी मुकाम का बेसब्री से इंतजार करते हों.

तो इस तरह उनके जीवन में ये लम्बा आराम चलता रहा.ये आराम उनकी ज़िदगी से भी बड़ा होने लग गया.घर और बाहर को जोड़ने वाली चंद चीज़ें थीं.

एक- डोर बेल
वो इतनी जोर से बजतीं थीं कि आजकल उसका बजना कम होने पर लगने लगा था कि दुनिया बड़ी चुप्पा सी हो गयी है.

दो-  टीवी
वो घर की एक दीवार पर लगा था. उसके ज़रिये डॉ कुमार अंदाज़ लगाते थे कि बहार दुनिया ठीक ठाक चल रही है.पर उसके विजुअल्स रियल टाइम में नहीं होते ऐसा डॉ कुमार का सोचना था.और टीवी घर को बाहर से  सीधा जोड़ने वाला उपकरण नहीं हो सकता.पानी में जैसे कोई सीधी चीज़ मुड़ी हुई दिखती है.ऐसे कुछ दिखाने का काम करता है टीवी. चीज़ें जैसी होती नहीं वैसी दिखाता है टीवी. अगर डॉ कुमार धर्म गुरु की भाषा में बोलते तो कहते टीवी शैतान का नुमाइंदा है.

तीन- टेलीफोन

ये काला और ठंडा उपकरण कई बरसों से लगा था.इसकी घंटी की आवाज़ भी घर के सन्नाटे को एक दम से तोड़ कर रख देती थी.डॉ कुमार टेलीफोन से बातचीत को इकतरफा संवाद जैसा मानते थे.बिना सामने वाले को देखे,बिना उसके हाव भाव को देखे आप उससे बात नहीं कर सकते.सिर्फ डार्ट गेम खेल सकते है.कभी जैसे तुक्के से संवाद स्थापित हो जाय जैसे.

चार- सनीचरिया या देशांतरी-

हर शनिवार को ये शनि भगवान के नाम पर तेल और आटा लेने आता था. इन दिनों वो शनिवार की आवाज़ देके आसपास फेरी देने चला जाता था और लौट कर आखरी घर के रूप में डाक्साब के यहाँ आता था. यहाँ वो उनके लॉन में तनिक देर फूंकारा खाता था. डाक्साब भी उससे कुछ देर कभी कभी बोल लेते थे. डाक्साब की उसके बारे में कोई खास राय नहीं थी पर ज़ाहिर है वो उसे नापसंद भी नहीं करते थे.





इन चारों के अलावा दो और थे जो इस घर को बाहर से जोड़ने का काम करते थे. नौकर रमेश और उर्मिला.
रमेश कम बोलता था पर उर्मिला बातूनी थी.उसे काम करते करते बोलने में दक्षता हासिल थी. रमेश वैसे ही कम बोलता था और उसे लगता था कि काम और बोलना दोनों एक साथ नहीं हो सकता. रमेश बाज़ार के काम देखता था और उर्मिला घर के सारे काम किया करती थी. पर ये दोनों ही थे जो कम या ज्यादा, घर में और बाहर आवाजाही किया करते थे. और हां दोनों अपने अपने घरों में रहते थे इसलिए इस घर में रोज़ उनका बाहर से आना और बाहर को जाना कम से कम एक बार तो होता ही था. असल में उर्मिला की मां पहले इसी घर में काम करती थी. उर्मिला तब छोटी थी. उन दिनों उर्मिला की मां ही अकेली नौकर ही थी. उर्मिला को कभी कभार वो अपने साथ ले आया करती थी.बरसों तक ये सिलसिला चला.उर्मिला बड़ी होने लगी और वो अपनी मां के साथ अक्सर इस घर में आने लगी. वो थोडा बहुत मां का हाथ बंटा देती थी. फिर उर्मिला ज्यादा आने लगी और उसकी मां का आना कम होने लगा. जैसा कि उम्र बढ़ने के साथ उन दिनों होता था, उसकी मां खांसी से परेशान रहने लगी. खांसी शुरू होने पर रुकने का नाम ही नहीं लेती थी. डॉक्टरों वाले इस घर में भी उसकी कोई मदद हो नहीं पाई. अब सिर्फ उर्मिला ही इस घर में आने लगी. उसकी मां ने आना बिलकुल बंद कर दिया था. मां की जगह उर्मिला इस कदर धीरे धीरे आई थी कि घर वालों को इस परिवर्तन का पता ही नहीं चला. उनके लिए जैसे उर्मिला ही हमेशा से इस घर में आती रही थी. उर्मिला घर का सारा काम बहुत दक्षता से करती थी पर वो अकेली इस घर के काफी नहीं थी. खासकर तब से जब इस घर के लोग घर से बाहर निकलने में दिक्कत महसूस करने लगे, ऐसा भी धीरे धीरे ही हुआ था और पूरे घर का बूढाते जाना इसमें मुख्य कारण था, तब रमेश को रखा गया.रमेश की ज़िम्मेदारी घर से बाहर के कामों की थी.बाज़ार से सौदा लाना,बिल विल जमा करवाना, दवा दारु का प्रबंध वगैरा वगैरा. ऐसा नहीं था कि रमेश के जिम्मे सिर्फ और सिर्फ घर से बाहर के ही काम थे, बल्कि घर में नल ठीक करना,बिजली के बल्ब बदलना,कील ठोकना जैसे काम भी उसी के दायरे में आते थे. रमेश का मन पढने में नहीं लग पाया.वो ग्यारहवीं तक किसी तरह पढ़  पाया फिर उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया.घर की हालत कुछ खास अच्छी नहीं थी कहना अंडर स्टेटमेंट होगा.घर की हालत ख़राब थी.बड़े भाई महेश ने पिताजी का रिटायर्मेंट के बाद मिले पैसे को ठिकाने लगा दिया था.और जब लगा कि अब कुछ बाकी नहीं है,बीवी को लेकर अलग रहने लगा. ये एक तरह से ठीक ही हुआ. कम से कम पिताजी को अपनी पेंशन के पैसे खुद खर्च करने का हक़ हाथ आ गया. अगर महेश साथ रहता तो वो महीने दर महीने इन पैसों पर भी डाका डालने की फिराक़ में रहता. रमेश अपने भाई की की करतूतों और बाकी सब वजहों से काम की तलाश में था और उसे यहाँ मिले काम में कोई ज्यादा हर्जा नहीं था. इधर उर्मिला तब तक 12 वीं पास कर चुकी थी और उसके घरवालों की आगे पढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. खुद उर्मिला का भी पढाई में कोई खास इंटरेस्ट नहीं था. वो डॉ. कुमार के घर में इस कदर सहज हो चुकी थी कि उसका अपने घर से ज्यादा वक़्त यहीं बीतता था. कहना ग़लत नही होगा कि इस घर के साथ उर्मिला का जैविक रिश्ता बन चुका था. वो इस घर में रमेश की सीनियर भी थी. शुरू में रमेश को इस घर और खासकर परिवारवालों के साथ एडजस्ट करने में दिक्कत हुई थी और उसे हर रोज़ किसी न किसी बात पर डांट खानी पड़ती थी. पर धीरे धीरे वो भी इस घर के लिए अपरिहार्य सा हो गया था.

तो इस घर के तीन लोगों के साथ दो नौकरों का जीवन झील के पानी की तरह स्थिर चल रहा था. कोई खास हलचल नहीं. रोज़मर्रा के तयशुदा काम. उन्हें तयशुदा तरीकों से निपटाना. बेशक पाँचों एक साथ नहीं बैठते थे पर थोडा थोड़ा एक कुनबे की तरह दिखने लग गए थे. अब रमेश और उर्मिला भी रात होते होते ही इस घर से निकलते थे और जल्दी सुबह इस घर में वापस आ जाते थे. उन दोनों के अपने घर रात बिताने की सराय से हो गए थे. इस घर के तीनो लोगों की दिनचर्या बहुत तय शुदा थी. बिलकुल समय सारणी में बंधी. विपिन ही उनमें ऐसा था जो घर के काम से कभी कभार बाज़ार निकल जाया करता था पर आजकल तो वो भी बाहर का काम रमेश के सर डालने की कोशिश में रहता था.उसे अपनी कविताओं से फुर्सत नहीं थी. उसके कुल दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे पर इस बात को बरसों हो गए.उसका दूसरा संग्रह भी प्रकाशित हुए 15 बरस हो गए थे. ऐसा लगता था कि उसे कविताएं लिखने में ही रूचि रह गयी थी छपवाने में वो कम विश्वास करने लगा था.