Wednesday, August 16, 2017

एक पासपोर्ट साइज़

स्मृति के कोई दर्ज़न भर स्थिर-चित्रों से बना था उसका शहर. उसका शहर पतली सड़कों और बक्सेनुमा मकानों का संकुल न होकर कुछ चित्रों की लड़ी था. इस लड़ी को दोनों सिरों से कहीं बांध दो तो रंग बिरंगी झालर की तरह दिखने लगता था ये शहर. शहर की जो तस्वीरें उसकी मिल्कियत थीं उनमें एक तो थी चौराहे के आइसक्रीम पार्लर की. और एक कच्चे, पीले रास्ते की जो कही ले जाने के बजाय भटकाता ज्यादा था. (वैसे यही इसका सुख भी था). एक कोने की थी जो दो ऊंची दीवारों के मिलने से बना था. दोनों दीवारों में से एक में बीचो बीच पीपल उगा था और शाखें दीवाल फोड़ कर बाहर आ रही थीं.

एक तस्वीर स्कूटर मैकेनिक की दुकान वाली थी. एक हैलोजन लाइट फेंकते खम्भे की.  और एक पोस्ट बॉक्स की भी. ऐसी ही कुछेक और तस्वीरों से बना था उसका शहर. पर हां एक तस्वीर जिसका अभी ज़िक्र नहीं हुआ और जो बाकी की रंगीन छवियों से जुदा थी और जिसके बिना उसका ये शहर स्मृतियों का नगर नहीं बन सकता था वो एक ब्लैक एंड वाइट पासपोर्ट साइज़ फोटो थी.  बाकी ग्यारह के ग्यारह चित्रों के रंग फ़ीके पड़ते जा रहे थे  पर इस श्वेत श्याम छवि को वो हर दिन नवीन और युवतर होते हुए ही देखता था.

असल में ब्लैक एंड वाइट फ़ोटो शहर की तस्वीर नहीं थी. ये तो एक लड़की का पासपोर्ट साइज़ फोटो था. ये एक फोटो ज़रूर था पर इस पर नज़र पड़ते  ही एक पूरा एल्बम उसके सामने खुल जाता था. एल्बम के हर चित्र में वो लड़की ज़रूर होती. बल्कि वो लड़की ही होती.अलग अलग मूड, मुद्राओं में. कई बार तो उस अल्बम के एक ही फोटो में लड़की अलग अलग वक्त में अलग मुद्राओं में नज़र आती थी. अक्सर जैसे उसके सामने फेसेज़ बनाती हुई. उसे सामने देखकर तो और भी मुंह बिगाड़ती सी लगती थी.

शहर की स्मृतियों की पन्नियाँ. रंग बिरंगी.चित्रित. उड़ती हुई, लहराती हुईं. हवा में अपना संतुलन खोती ये पन्नियाँ कितनी भली लग रही थीं. पर इस समय उसके सामने जो शहर था वो अलग था.उस शहर से जुदा जो उसी की कुछ पुरानी यादें धुंधला नक्शा उतारे थीं. वो सोचने लगा, आया तो वो उसी शहर में था! फिर क्या हुआ कि उसकी याद के स्टिल्स से बना शहर कोई और शहर मालूम होता था.इस जिंदा से लगते शहर से जुदा.स्पर्श से भी जिसे पहचाना न जा सके.

स्पर्श पहचान करने की आखरी हद होता है.
कैसे कोई वृद्धा बरसों बाद परदेस से आये पाँव छूते पोते की तस्दीक उसे जगह जगह से छूकर करती है.यहाँ इस नए शहर में जितना मर्जी अपना पुराना खोजने की वो कोशिश करता, उसे कोई और ही शहर हाथ लगता. उसे शक होने लगा कि कहीं वो किसी अनजान शहर में तो गलती से नहीं आ गया. उसने सर उठाकर देखा, शहर का दुर्ग मजबूती से खड़ा था.

वो और ज्यादा परेशान हो गया. क्या दुर्ग शहर का हिस्सा था या शहर इसके पडौस में बसा हुआ था? दुर्ग उसका पहचाना था पर शहर से फिर भी जान पहचान निकल नहीं रही थी. क्या शहर खानाबदोशों का डेरा भर होता है? कि कुछ बरस किसी किले के बगल में डेरा डालो और फिर कहीं और के लिए निकल लो.पीछे कोई नया काफिला अपने खच्चरों- टट्टुओं के साथ तैयार खड़ा है इसी जगह  कुछ बरस डेरा डालने को. वो भी एक यायावर की तरह इस जगह आया था. आने के कई दिनों तक वो संकोच में रहा. शहर उसके लिए सिमटा रहा तो बाँहें उसने भी नहीं फैलाई. वो चाय की दुकानों में नरमाहट ढूंढता रहा. फिर एक दिन उसकी दोस्ती एक जूते चप्पलों के दुकानदार से हुई. वो गया था अपने लिए एक जोड़ी नए जूते खरीदने और साथ में एक दोस्त मुफ्त में ले आया. दुकानदार उसकी उम्र का ही था. कह रहा था बड़े भाईसाब और वो साथ में चलाते हैं ये दूकान.पैसा भाई साब का है और बैठता वो है.जेंट्स और लेडीज दोनों के लिए जूते सैंडल रखता है.

दोस्ती लगातार बढती गई. हीरालाल था दुकानदार का नाम. दिखने में सुन्दर.  वो शाम को वहीं बैठने लगा.हीरालाल की दूकान उसकी बैठक हो गयी. एकाध घंटा गप्प मार कर, चाय पीकर ही उठता वो. हीरालाल को भी उसकी संगत अच्छी लगती थी.

एक दिन..शाम का वक्त था. दुकान पर वो बैठा था. हीरालाल कहीं  गया हुआ था.ये कोई नई बात नहीं थी.हीरालाल उसके आने पर कई बार सिगरेट पीने पान के केबिन पर चला जाता था. दूकान में सिगरेट न पीने का उसूल था. उसी समय एक लम्बी सी लड़की दुकान में आई.वो एक आम ग्राहक थी. उसे अपने लिए सैंडल चाहिए थे. उसने उस लड़की को रुकने के लिए कहा. हीरालाल आने ही वाला था. लड़कियां परदेसियों को पहचान जाती है. कुछ मिनट की देरी के बाद उस लड़की ने उससे पूछा था कि कितना वक्त हो गया इस शहर में आये हुए, उसने दिन गिनकर बता दिए.

जैसा कस्बाई प्यार में होता है, परदेसी से दिल लगाने का मामला खतरनाक पर अनिवार्य सा होता है. छोटे शहरों की मुट्ठी में बंधे लोग अक्सर के दूसरे के पास आने को अभिशप्त होते है. वो दोनों अक्सर एक दूसरे को दिख ही जाते थे. वहां कई दिनों या महीनों की आँख मिचौली संभव ही नहीं थी. कोई दूर का ही प्रेमी हो सकता है एक क़स्बे की प्रेम कथा में. वर्ना हीरालाल ही क्या बुरा था? हीरालाल में एक एक प्रेमी की सारी खूबियाँ तो थी पर क़स्बे का प्रेम दूरियों और अपरिचय के तंतुओं से बनता है. उस परदेसी के रिश्ते-नातों की डोरियों का गुच्छा सुदूर में कहीं था जिसे वो लड़की नहीं जानती थी. उस परदेसी का घर, उसके परिजन उस लड़की के लिए अस्तित्व में नहीं थे. वो उस ‘बार गाम’ के लड़के को ही उसके ‘सम्पूर्ण’ के रूप में जानती थी.




लड़की की तरफ से एक महीन, सूक्ष्म और क्षणिक मुस्कान ने पहले से ही मौजूद हेडी मिक्स में तूफ़ान ला दिया. वो एक तीव्र बहाव में बह गया जिसके खिलाफ जाने की उसने कोई कोशिश नहीं की. असल में उसे समझ में आने से पहले ही ये सब घटित हो गया.

उस लड़की के साथ इस नए जन्मे रिश्ते में भले ही वासना या हवस ढूंढी जाय पर ये था प्रेम ही. ठीक ठीक किताबों वाला या अपने परिशुद्धतम रूप जैसा प्राचीन समय से लिपिबद्ध है वैसा नहीं पर प्यार वाला ही प्यार. इस ज़माने वाला भी नहीं. छोटे शहर- कस्बों वाला, अगर सटीक रूप से कहा जाय.

लड़की हीरालाल की दुकान पर एकाध बार ही आई फिर नहीं आई. हीरालाल को वो अपने प्यार की जानकारी देना नहीं चाहती थी क्योंकि वो भले उसके महबूब का दोस्त था, पर था वो असल में उसका अपना शहर जिस तक वो अपने प्यार की फुसफुसाहटों को पहुँचने नहें देना चाहती थी.शहर चाहे उसका पिता भाई या दोस्त ही क्यों न हों प्यार के मामले में क्रूर बनते देर नहीं लगती.

उसे एक कहानी की याद हो आई जिसमें झामन ने अपनी ही बेटी का क़त्ल कर दिया था. वो बेटी जिसने एक परदेसी को दिल दे दिया था.बाद में झामन ने भी एक पेड़ से लटक कर फंसी लगा ली थी. एक बिलकुल तनहा खड़े उसी पेड़ से झामन के रोने की आवाजें क़स्बा कई बरस सुनता रहा था.

लड़की के दूकान पर न आने से उसने भी अपने दोस्त हीरालाल को छोड़ दिया. उस छोटे से, कम आबादी के शहर में वो और लड़की कोने तलाशने लगे. शुरू में शहर में एकांत के अनेक द्वीप थे जहां वे समय से परे चले जाते थे, पर धीरे धीरे वे सब एक अनजान भय के कोहरे में डूबते गए. अब उन्हें शहर में कोने मुश्किल से नसीब होने लगे थे. उसे उन दिनों शहर अचानक आबादी से भरा, भीड़ से ठसा शहर लगने लग गया.वो बमुश्किल लड़की को मुख्य सड़क पर आते जाते ही देख पाता था. उसकी ख्वाहिशों में लड़की को देखना भर रह गया था. वो सड़क पर एक दिन सबके सामने लड़की को चूमना चाहता था. पर लड़की का दिखना भी उसके लिए उत्सव जैसा हो गया. वो छोटा शहर उसके लिए महानगर सा हो गया. और उसमें जैसे वो लड़की गुम हुए जा रही थी.

और एक दिन वो लड़की उस शहर से गायब हो गई. एक आदमकद अहसास बना रह गया.फिर उसके अस्तित्व से भी उस लड़की की उपस्थिति फिसलने लग गई. दुनिया के मेले में लड़की का हाथ उससे छूट ही गया था, उसकी आत्मा से भी वो लड़की जाती रही. पर उसका भार वो महसूस करता रहा.

शहर छोड़ने से पहले उसके पास उस लड़की का ब्लैक एंड वाइट फोटो था. पासपोर्ट साइज़ का. वो फोटो ही अब उसके लिए वो लड़की था. वो गुम भी गया तो भी उसका प्रिंट उसके मस्तिष्क में बना रह जाने वाला था.लड़की जैसे तिलतिल उससे आजाद हो रही थी. पहले वो कहीं चली गई, फिर उसकी मौजूदगी, फिर उसका अहसास और अब अरसे बाद लड़की की उपस्थिति का भार जब उसके मन से जाता रहा. पर इससे उसे काफी अच्छा लगने लगा. वो इस प्रक्रिया में खुद भी जैसे के पाश से छूटता गया था. उसने शहर को शुक्रिया कहा.  







फिर से इस शहर में किसी सड़क के कोलतार पर चलते उसके जूतों के सोल चिपक रहे थे. गर्मी ने कोलतार को गर्म लिसलिसे द्रव में बदल दिया था. पर उसकी याद में उतरा शहर ठंडा था.आसमान से नर्म बर्फ गिर रही थी.

Saturday, October 22, 2016

भग्न स्तूप

ये सिल्क रूट पर आया कोई बौद्ध स्तूप था.
सिल्क रूट अगर कोई सड़क थी तो वो इतिहास में चलती थी.
ये बौद्ध स्तूप भी तारीख़ में ज़रूर तन कर, सीधा खड़ा था, आज ध्वस्त, भग्न और बिखरा था. आस पास की ज़मीन से ऊपर उठा पत्थरों का ढेर.  ढूह जैसा कुछ.  कुछ दूरी पर मठ में भिक्षु रहा करते थे.  कभी.  आज यहाँ तीन- चार फीट की चौकोर दीवारें गिरती पड़ती दिखाई दे रही थीं.

आसपास एक सुनसान था. ज़मीन पथरीली और खुली थी.
तिनका मात्र भी दिखाई देना मुश्किल था.
पत्थर के टुकड़े, असंख्य आकारों में.  और धूल पसरी थी. धूल महीन थी. उसके कण इतने बारीक थे कि हल्के थे. किसी हवा में इस धूल के कण उड़ते तो उड़ते रहते. हवा के रुकने पर भी वे कई देर मंडराते रहते.
पत्थर भी बड़े कच्चे थे. उन पर पाँव रखते ही वे धूल में बदल जाते और फिर किसी हवा में अपने बारीक कणों के साथ चक्कर खाते रहते.
लगता था पत्थरों में कण आपस में किसी दूर की रिश्तेदारी से ही बंधे थे. और उनमें बिखरने की प्रतीक्षा भरी थे.
भूदृश्य का रंग मटमैला था. दृष्टि की आखरी हद तक सिर्फ धूसर रंग ही दिखाई पडता था. कोई आवाज़ नहीं.  बस सुनसान. धूसर सुनसान.

सुनसान का रंग जैसे धूसर होता है.

कोई पानी नहीं, कोई घास नहीं. हरा रंग सिर्फ शिराओं में. कोई क्यों आये, पर कोई  यहाँ आये तो उसकी स्पंदित होती शिराओं में. या इन पत्थरों के बीच कहीं कहीं किसी खनिज-शिराओं में.
हरे रंग का कोई महंगा खनिज था.और कहीं होता तो कई चरणों से होकर, लदान और ढुलाई के चक्रों से निकल कर किसी की ऊँगली में पहनी जाने वाली मुद्रिका में धंस चुका होता अब तक.




बौद्ध स्तूप और मठ के ये अवशेष इस उबड़ खाबड़ में मिश्रित भाव जगा रहे थे.




अट्ठारह सौ बरस पहले यहाँ की तेज़ हवा में अपना उत्तरीय सम्हाले भिक्षुओं का चित्र कल्पना में टिमटिमाता है.
वे कुछ नहीं बोलते. चुपचाप रहते हैं. ये चीनांशुक मार्ग कारवाओं से लदा रहता है. खुरों से यहाँ की पथरीली ज़मीन में खरोंचे डालते घोड़े और पैदल चलते यात्रियों में द्रुत और विलंबित की विचित्र संगति है.

स्तूप में बुद्ध के किसी शिष्य के अवशेष है. मठ में कुछ दर्ज़न भिक्षु हर वक्त रहते है. सिल्क रूट यहाँ से कुछ ही दूर चलता है. वहां की अपेक्षाकृत चहल पहल से यहाँ का जीवन अछूता ही है. जैसे पास से गुज़रती  व्यापारियों की प्रसिद्ध सड़क से इसका कोई लेना देना ही नहीं हो. भिक्षु भी उसी रास्ते चलकर आये हैं,पर सड़क छोड़कर यहाँ आने के बाद सड़क उनके मार्ग की बात नहीं रही.

आज ये जगह सुनसान थी.पर कभी यहाँ रह रहे भिक्षुओं के प्राचीन रक्त का ताप अभी भी महसूस हो रहा था.उनकी धमनियों में बहता रुधिर अपने दाब का अहसास अभी भी करा रहा था. जिस महान बौद्ध दार्शनिक के अस्थि-पुष्प यहाँ रखे थे वो अभी भी जीवित था यहाँ जैसे.

Tuesday, August 30, 2016

भय के कोने

भय से निजी कुछ नहीं. कुछ पल हर आदमी के जीवन में लौट लौट कर आते हैं जिनमें वो निष्कवच होता है, नितांत अकेला होता है. और सबसे ज़्यादा निर्बल भी. वो इन पलों में बुरी तरह डरा हुआ होता है.ऐसे पल जीवन के लिए भारी और मृत्यु के लिए उर्वर होते हैं.ये क्षण हमारे नितांत निजी डर के होते हैं. प्रेम से भी अधिक निजी. ये इतने निजी होते हैं कि इन्हें हम सबसे अकेले भोगते हैं. इनमें हम सबसे अकेले होते हैं. रावण को शायद उसके इन्हीं क्षणों में मारा गया था.

शर्तिया भय कोई वनैला जानवर होता है. वो हमारे इन्हीं पलों में चुपचाप हमारे पास और हमारे भीतर आता है. वो करीब आकर हमें वेध कर हमारे भीतर व्याप जाता है.जिस तरह से ये हमारे अन्दर घुसता है, बिलकुल किसी बाण की तरह हमारी मज्जा को भेद कर, उससे लगता है ये प्राणी किसी नुकीले थूथन वाला है और भयानक तीखे दांत से वो हमारे अस्तित्व के तंतुओं को कुतर जाता है.

ऐसे ही भय के कुछ पते-ठिकाने भी होते हैं. इन्हीं पर उसके बैठे होने की गुंजाइश सबसे ज्यादा होती है. वो इन ठिकानों पर दुबक कर नहीं बैठा होता बल्कि घात लगा कर बैठा होता है. एक निर्जन रास्ते को काटता सांप अपने पीछे एक लकीर छोड़ जाता है. एक आदमी सांप को जाते देख ठिठकता है. एक सांप आदमी को जाते देख ठिठकता है. दोनों के लिए वो रास्ता डर का ठिकाना है. अगली बार उसी रास्ते पर जाता आदमी कुछ और ठिठक कर चलता है.अगली बार किसी और समय में जाता सांप उसी रास्ते को काटते वक्त अपने फन के पूरे प्रसार के साथ अंग्रेजी का 'एस' बनाकर चला जाता है. उसका डर उसके फन का फैलाव है. वो डर में और चौड़ा हो जाता है. आदमी डर में खुद को सिकोड़ कर चलता है. पर भय को लेकर दोनों की आतंरिक प्रतिक्रिया एक जैसी ही है.


वो आदमी उस तहखाने के नाम से डरता था. तहखाना घर में था. घरवाले कहते थे इस तहखाने में बरसों से एक मगरमच्छ रहता है. घर के एक सबसे बड़े आदमी को छोड़कर सब उस तहखाने के नाम से डरते थे. कोई उसमें जाने की बात भी नहीं सोचता था. बस उस सबसे बुज़ुर्ग आदमी को ही पता था कि शायद उसमें ऐसा कुछ नहीं है. शायद घर के कुछ राज़ उस तहखाने में दफ़न थे. वो तहखाना रहस्य की किसी कन्दरा जैसा था. उसमें जाना निषिद्ध था. बरसों बीतने के बाद धीरे धीरे उस घर के लोगों को एक एक कर पता चलने लगा कि तहखाने में मांसभक्षी उभयचर के होने की बात ठीक नहीं है. पर आखिर जब सब लोगों को पता चला कि उस तहखाने में ऐसा कुछ नहीं है तब भी वे उसमें जाने से डरते थे. वे जानते थे कि तहखाने में मगरमच्छ नहीं है पर कुछ ज़रूर है जो अप्रिय है और उसे उसकी वाजिब भयावहता प्रदान करने के लिए मगरमच्छ का नाम भर दिया गया है. हो सकता है अन्दर जो कुछ हो वो और भी विकराल हो. और इस तरह उस घर के लोगों के लिए डर का दायरा बढ़ने लगा. भय का वृत्त बढ़ने लगा, जो पहले तहखाने तक था वो फिर उस कमरे तक बढ़ गया जिसमें तहख़ाना था. कुछ अरसे बाद वो फिर बढ़कर घर के चौक, फिर मटकी रखने की जगह और फिर सीढ़ियों तक फ़ैल गया.

इस तरह भय को रहने के लिए किसी कोटर, बांबी या तहखाने की ज़रुरत नहीं होती, वो अपने रहने की शुरुआत इन जगहों से कर सकता है पर वो आसानी से घर-महल्ले तक आ सकता है. उसके जबड़े शक्तिशाली और दांत धारदार होते हैं. 

वो समय की कई परतों को चीरता आया हैं.

Sunday, July 31, 2016

निशान

रूस में खुलेपन और पुनर्निर्माण के अग्रदूत मिखाइल गोर्बच्यौफ़ के गंजे सर पर एक दाग़ नुमाया होता था.ये दाग़ उनके नज़र आने से पहले ही नज़र आता था. मैंने पहली बार तो यही सोचा था कि किसी कबूतर ने बीट कर दी है. अगली बार फिर नज़र आने पर यही सोचा, टीवी में कुछ गड़बड़ है. फिर जब अख़बारों और पत्रिकाओं में उनके फोटो पर भी वो निशान नज़र आने लगा तब जाकर लगा कि कुछ चमड़ी की बीमारी से सम्बंधित बात होगी. अरसे तक मैं ये बात भूल गया था.

दुनिया तो खैर गोर्बच्योफ़ को ही भूल गयी थी.


फिर ये बात कहाँ से फिर उठ गयी ?

अभी हान कांग की किताब 'द वेजीटेरियन' पढ़ रहा था. तीन भागों में बंटी ये छोटी सी किताब एक  दुःस्वप्न के कारण शाकाहारी बनी एक विवाहिता युवती 'योंग हाई' के हाथ से इस दुनिया के धीरे धीरे छूटते जाने की कहानी है. सैनिटी से निकल कर इन्सेन होने का रास्ता कितना छोटा होता है ! जैसे बस एक कमरे से निकल कर दूसरे कमरे में ही जाना हो.कभी कभी तो जैसे सिर्फ एक देहरी से बाहर कदम भर रखना हो.इस तरफ से उस तरफ का शिफ्ट.

उपन्यास के दूसरे अध्याय 'मंगोलियन मार्क' में ज़िक्र आता है कि योंग हाई का बहनोई अपनी साली के नितम्ब पर बने जन्मजात मंगोलियन मार्क के बारे में सोच कर उत्तेजना से भर जाता है. योंग हाइ की देह के ढंके हिस्से पर बना एक नीला सा निशान उस आदमी के मन में होरमोंस का प्रपात ट्रिगर कर देता है.सौंदर्य के प्रचलित और पारंपरिक व्याकरणों में इस तरह के नियम बहुत आम है कि चेहरे पर बना कोई तिल या मस्सा खूबसूरती को बढ़ा या घटा देते है.पर क्या वो सब जो उत्तेजक और मादक है उनके लिए भी कुछ इसी तरह का कसा हुआ व्याकरण है? या फिर, योंग हाइ का बहनोई अपने नियमों की किताब खुद लिख रहा था? किताब का पहला भाग योंग और उसके पति के बारे में है. उसके पति को योंग एक बेहद औसत युवती ही लगती थी.त्वचा से बीमार, उभरी हुई दिखती गालों की हड्डियां.कुल मिलाकर एक अनाकर्षक व्यक्तित्व था उसके पति की नज़र में योंग का. उसके लिए वो पत्नी थी.उसकी इच्छाओं का साथ देने वाली.वो इच्छाएं उपजाती नहीं थीं. बस पति जब प्रोविज़ंस से भरे कैरी बैग्स के साथ अपनी लालसाओं से भी लदा रात को घर आता था तो वो उसका तमाम बोझ उतार देती थी. सवाल ये है कि योंग का पति जब उसके साथ ज्वार में डूबता उतराता था तब क्या उसने उस मंगोलियन मार्क पर अपनी नज़रें नहीं टांकी थी? पति की नज़र में योंग हाइ का औसतपन उसके नितम्ब पर बने निशान के साथ ही था. यानि वो निशान अगर हट जाए
तब भी वो औसत ही थी. और रख लें तब भी वो एक आम, साधारण, 'कुछ ख़ास नहीं' टाइप युवती थी. उसके लिए उसका निशान भी अस्तित्व ही नहीं रखता था.

एक तरफ़ योंग हाइ लगातार अपनी देह को लेकर बेपरवाह हो रही थी दूसरी ओर उसका निशान किसी के लिए एक वेगवान न्यौता बनता जा रहा था.एक गुप्त निमंत्रण.एक चोर निमंत्रण. क्योंकि एक चोर निमंत्रण ही ताकतवर निमंत्रण होता है. ये बेहद निजी और बुलावे की वास्तविक इच्छा पर आधारित होता है.
ऐसा आवेगों से भरा न्यौता जो उसके जीजा के लिए एक ऐसा दंश बन गया था जिसे उतार फेंकना था, किसी भी तरह. कम से कम एक बार.



शरीर पर बने ये निशान दैहिक भाषा की जटिल अभिव्यक्तियाँ हैं.


इस तरह के निशान जितना भी कुछ कहते हैं उसका अनुवाद आदमी अपनी समझ की भाषा में अपने उपकरणों से करता है.हर अनुवाद में कुछ न कुछ छीजत ही होती है, ज़रूरी नहीं. कभी कभी मूल से व्यापक जोड़ लिया जाता है. पर ज़ाहिर है, ये काम पेचीदा बहुत है.

जब हरेक का अपना अनुवाद है तो इस तरह के निशान हर आदमी में एक जैसी प्रतिक्रिया तो नहीं ही पैदा करते होंगे, और ऐसे देह चिन्हों की भौगोलिक स्थिति भी रिस्पोंसेज़ की भिन्नता का कारक होतीं होंगी, पर जिन लोगों को भी इस तरह के 'मार्क' में कुछ ख़ास नज़र आता है,क्या वो लोग एक जैसी होती दुनिया में कुछ ख़ास को देखकर उसे एक अलग दर्ज़ा देना चाहते है? ये क्या औसत के प्रति विद्रोह है? या साधारण को असाधारण गरिमा प्रदान करना है?

हम शक्ल से भले दूसरे लोगों से अलग दिखते हों पर गणित के लिहाज़ से हम अपने सजातीय लोगों से सिर्फ रंग और अनुपात में ही कुछ अलग होते है.क्या ऐसे में इस तरह के निशान ही ख़ास पहचान का अहसास कराते हैं?

इस तरह का टेढ़ा चिंतन जोख़िम भरा है. और गोर्बच्यौफ़ और योंग हाई को साथ रखना और भी जोखिम भरा. इन दोनों में समानता सिर्फ एक दाग़ भर है,पर असमानता की खाई शायद बहुत बड़ी है.